अध्याय 1
योग क्या है — और क्या नहीं है
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः॥ — स्रोत: योगसूत्र १.२
अर्थ: योग चित्त की वृत्तियों का निरोध है।
योग की सारी भूमि इस एक सूत्र में आ जाती है, पर यदि इसे जल्दी समझ लिया जाए तो योग खो जाता है। चित्त केवल मन नहीं है। चित्त वह पूरा आंतरिक आकाश है जिसमें स्मृति उठती है, कल्पना उठती है, भय उठता है, प्रेम उठता है, इच्छा उठती है, पहचान उठती है। वृत्ति उस आकाश की तरंग है। और निरोध दमन नहीं है। दमन में मन मन से लड़ता है। निरोध में चित्त अपने ही स्रोत में विश्राम करता है। जैसे झील को शांत करने के लिए पानी को मारना नहीं पड़ता, हवा रुक जाए तो तरंगें अपने आप शांत हो जाती हैं। योग वही अवस्था है जहाँ आत्मा अपने ही प्रतिबिंबों के पीछे दौड़ना बंद कर देती है।
आज योग का अर्थ शरीर को मोड़ना, आसन करना, लचीला होना, स्वस्थ दिखना और ऊर्जा से भरा रहना समझ लिया गया है। यह योग का एक अत्यंत छोटा बाहरी अंश हो सकता है, पर योग का हृदय नहीं। शरीर योग का द्वार हो सकता है, पर योग शरीर तक सीमित नहीं। प्राण योग का क्षेत्र हो सकता है, पर योग प्राण-शक्ति का प्रदर्शन नहीं। ध्यान योग का अंग है, पर योग केवल आँख बंद करके बैठना नहीं। योग मनुष्य के पूरे अस्तित्व का प्रश्न है — मैं कौन हूँ, मैं क्यों बंधा हूँ, और जो मुझे देख रहा है, उसका स्वरूप क्या है?
आधुनिक संसार ने योग को उपयोगिता में बदल दिया है। कोई तनाव घटाने के लिए योग करता है, कोई शरीर सुंदर रखने के लिए, कोई स्वास्थ्य के लिए, कोई मानसिक संतुलन के लिए। इन सबका अपना स्थान है, पर पतंजलि का योग इनसे बहुत आगे है। पतंजलि मन को आराम देने नहीं आए; वे मन की जड़ देखने आए। वे शरीर सुधारने नहीं आए; वे पहचान सुधारने आए। वे जीवन को अधिक सफल बनाने की पद्धति नहीं देते; वे उस देखने वाले की ओर ले जाते हैं जो सफलता और असफलता दोनों का साक्षी है।
तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्॥ — स्रोत: योगसूत्र १.३
अर्थ: तब द्रष्टा अपने स्वरूप में स्थित होता है।
“तब” कब? जब चित्त की वृत्तियाँ शांत हो जाती हैं। द्रष्टा तब नया नहीं बनता, वह केवल अपने स्थान पर लौटता है। जैसे बादल हटते हैं तो आकाश पैदा नहीं होता, केवल दिखाई देता है। द्रष्टा हमेशा था, पर वृत्तियों के साथ तादात्म्य ने उसे छिपा दिया था। योग का अर्थ द्रष्टा को बनाना नहीं; द्रष्टा को द्रष्टव्य से अलग पहचानना है। यह पहचान जितनी सूक्ष्म होती है, उतना ही स्पष्ट होता है कि तुम्हारा दुःख घटनाओं से कम और घटनाओं से बनी हुई गलत पहचान से अधिक है।
वृत्तिसारूप्यमितरत्र॥ — स्रोत: योगसूत्र १.४
अर्थ: अन्य समय में द्रष्टा वृत्तियों के साथ सारूप्य कर लेता है।
यही मनुष्य की साधारण अवस्था है। क्रोध आया तो “मैं क्रोधित हूँ।” भय आया तो “मैं भयभीत हूँ।” इच्छा आई तो “मैं इच्छुक हूँ।” स्मृति आई तो “मैं वही हूँ जो मेरे साथ हुआ।” चित्त की प्रत्येक लहर द्रष्टा पर अपना रंग चढ़ा देती है। योग इस रंग को मिटाने की हिंसक कोशिश नहीं करता। वह केवल यह दिखाता है कि रंग दिखाई दे रहा है — अतः तुम रंग नहीं हो। जो देखा जा रहा है, वह तुम नहीं हो। यह सूक्ष्म विवेक ही योग की प्रारंभिक ज्योति है।
श्वेताश्वतर उपनिषद योग की भूमि को और गहरी बनाता है। वहाँ ऋषि अभ्यास की बात करने से पहले प्रश्न उठाते हैं। वे अस्तित्व के मूल कारण को पूछते हैं। योग तकनीक से नहीं, प्रश्न से शुरू होता है।
ब्रह्मवादिनो वदन्ति। किं कारणं ब्रह्म कुतः स्म जाता जीवाम केन क्व च सम्प्रतिष्ठाः। अधिष्ठिताः केन सुखेतरेषु वर्तामहे ब्रह्मविदो व्यवस्थाम्॥ — स्रोत: श्वेताश्वतर उपनिषद् १.१
अर्थ: ब्रह्म को जानने वाले पूछते हैं — कारण क्या है? ब्रह्म क्या है? हम कहाँ से उत्पन्न हुए, किसमें स्थित हैं, और किसके अधीन सुख-दुःख में चलते हैं?
यह प्रश्न योग की मूल अग्नि है। योग केवल यह नहीं पूछता कि शरीर कैसे स्वस्थ हो, मन कैसे शांत हो, जीवन कैसे सफल हो। योग पूछता है — मैं किसके अधीन हूँ? यह जन्म, यह दुःख, यह सुख, यह मृत्यु, यह चाह, यह भय — किस आधार पर चल रहा है? जब यह प्रश्न पूरे अस्तित्व से उठता है, तब मनुष्य साधक बनता है। योग व्यायाम नहीं रहता; वह मानव-जीवन की सबसे पुरानी पुकार बन जाता है।
सांख्य के बिना योग की जड़ समझ में नहीं आती। पतंजलि का योग सांख्य की भूमि पर चलता है। सांख्य कहता है — पुरुष और प्रकृति को अलग पहचानो। पुरुष शुद्ध द्रष्टा है; प्रकृति दृश्य है — शरीर, इंद्रियाँ, मन, बुद्धि, अहंकार, गुण, सब। दुःख तब जन्मता है जब पुरुष स्वयं को प्रकृति मान लेता है। योग इस भूल को शांत करता है। इसलिए गीता भी दूसरे अध्याय में सांख्य से शुरू होती है। कृष्ण पहले अर्जुन को कर्म नहीं बताते; वे पहले उसे देखने की दृष्टि देते हैं। बिना दृष्टि के कर्म केवल प्रतिक्रिया है।
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥ — स्रोत: भगवद्गीता २.१६
अर्थ: असत् का अस्तित्व नहीं होता और सत् का अभाव नहीं होता। तत्त्वदर्शियों ने दोनों की सीमा देख ली है।
योग का विवेक इसी एक वाक्य में खड़ा है। जो बदल रहा है, वह अंतिम नहीं। जो अंतिम है, वह बदलता नहीं। शरीर बदलता है, मन बदलता है, भाव बदलते हैं, जीवन की भूमिकाएँ बदलती हैं। पर जो इन सबको जान रहा है, उसमें एक अजीब निरंतरता है। योग उसी निरंतरता को पहचानने की साधना है। इस पहचान के बिना योग केवल शारीरिक अनुशासन रह जाता है। पहचान के साथ वही आसन, वही श्वास, वही मौन आत्म-यात्रा बन जाते हैं।
योग क्या नहीं है, यह समझना भी उतना ही आवश्यक है। योग शरीर-प्रदर्शन नहीं। योग अनुभवों का संग्रह नहीं। योग चमत्कार नहीं। योग सिद्धियों की लालसा नहीं। योग पलायन नहीं। योग दुनिया से भागकर किसी निजी शांति में छिप जाना नहीं। योग ऐसा भी नहीं कि मन को जबरदस्ती चुप करा दिया जाए। पतंजलि के योग में अनुशासन है, पर हिंसा नहीं। स्पष्टता है, पर कठोरता नहीं। मौन है, पर मृत्यु नहीं। योग जीवित मनुष्य को उसकी जड़ तक ले जाता है।
जब मनुष्य योग की ओर सच में आता है, तो वह केवल शरीर लेकर नहीं आता। वह अपने भय लेकर आता है, इच्छाएँ लेकर आता है, भ्रम लेकर आता है, स्मृतियाँ लेकर आता है। योग उन्हें दबाता नहीं; योग उन्हें देखने की क्षमता देता है। धीरे-धीरे साधक देखता है कि मन की हर गतिविधि स्वयं को बचाने की कोशिश है। और फिर एक दिन यह देखना इतना शांत हो जाता है कि चित्त अपनी ही थकान से विश्राम में उतरने लगता है।
योग वही प्राचीन प्रश्न है जिसे मनुष्य पूरे शरीर, पूरे मन, पूरे प्राण, और अंततः पूरे मौन से पूछता है। यह प्रश्न है — जो बदल रहा है, क्या वही मैं हूँ? और यदि नहीं, तो मैं कौन हूँ?
अभ्यास
आज किसी आसन या विशेष ध्यान की आवश्यकता नहीं।
सिर्फ बैठो और देखो — अभी चित्त में कौन-सी वृत्ति प्रमुख है।
उसे बदलो मत, रोकने की कोशिश मत करो।
केवल इतना पहचानो — यह दिखाई दे रही है।
जो देख रहा है, उसके पास लौटना ही योग की शुरुआत है।