अध्याय 1
माया का मज़ाक: जब भगवान भी हमें हंसी में उड़ा देता है
माया कोई डरावनी शक्ति नहीं, एक दिव्य जादूगर है। वह रस्सी को साँप बनाती है और फिर हमें साँप से बचने की आध्यात्मिक तकनीक बेचती है। हम रोते हैं, भागते हैं, उपाय खोजते हैं, और पीछे कहीं भगवान मुस्कुरा रहा होता है: “बेटा, पहले दीया तो जलाओ।” माया का “मा” नहीं भी है, और मापना भी। जो है नहीं, उसे हम नापते रहते हैं - सम्मान कितना, धन कितना, प्रेम कितना, आध्यात्मिक विकास कितना। सवाल यह है कि जो माप रहा है, वह खुद कितना असली है?
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥ (स्रोत: भगवद्गीता ७.१४)
अर्थ: मेरी यह त्रिगुणमयी दैवी माया पार करना कठिन है; जो मेरी शरण आते हैं, वे इसे पार कर जाते हैं।
कृष्ण ने “मेरी माया” कहा है, किसी दुश्मन की माया नहीं। यानी खेल भी उसी का, खिलाड़ी भी उसी का, और दर्शक भी वही। हम अपनी समस्या को इतना निजी बना लेते हैं कि भगवान को भी प्रवेश-पास लेना पड़े। तुम जिस “मेरी कहानी” को बचा रहे हो, क्या वह सच में तुम्हारी है? या माया ने किरदार देकर कहा, “अब रोना शुरू करो”? शरण का अर्थ भागना नहीं; यह स्वीकार करना है कि जादूगर से लड़कर जादू नहीं टूटता।
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्। मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्॥ (स्रोत: भगवद्गीता ७.१३)
अर्थ: तीन गुणों से मोहित संसार उस अविनाशी परम को नहीं पहचानता।
तमस् कहता है, “सो जाओ।” रजस् कहता है, “दौड़ो।” सत्त्व कहता है, “अब थोड़ा refined spiritual बनो।” तीनों मिलकर मनुष्य को नचाते हैं, और मनुष्य कहता है, “यह मेरी personality है।” क्या तुम गुण हो, या गुणों को जानने वाली उपस्थिति? यह प्रश्न जितना सीधा है, अहंकार के लिए उतना ही असुविधाजनक।
रज्ज्वज्ञानात् क्षणेनैव यद्वद्रज्जौ हि सर्पधीः। तद्वदात्मन्यनात्मत्वं पश्यत्यज्ञानयोगतः॥ (स्रोत: विवेकचूड़ामणि, रज्जु-सर्प दृष्टांत)
अर्थ: जैसे रस्सी को न जानने से साँप प्रतीत होता है, वैसे ही अज्ञान से आत्मा में अनात्म प्रतीत होता है।
रस्सी में साँप दिखा, डर असली लगा। अब बताओ - डर असली था या साँप? जीवन में कितने साँप हैं: “लोग क्या कहेंगे”, “मैं असफल हूँ”, “अब सब खत्म”? क्या तुमने कभी दीया जलाकर देखा? ज्ञान साँप को मारता नहीं, बस प्रकाश देता है।
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। (स्रोत: भगवद्गीता २.१६)
अर्थ: असत् का अस्तित्व नहीं; सत् का अभाव नहीं।
माया का मज़ाक यही है कि अस्थायी चीज़ों पर हम स्थायी नामपट्टी लगा देते हैं। देह बदलती है, मूड बदलता है, संबंध बदलते हैं, विचार बदलते हैं - पर दावा रहता है, “मैं ऐसा ही हूँ।” भगवान मुस्कुरा रहा है, हम रो रहे हैं। पहली मुक्ति तब आती है जब अपने रोने को भी थोड़ा दूर से देख सको।