अध्याय 1
प्रश्न का जन्म
मनुष्य के भीतर सबसे पहला मंदिर किसी पत्थर से नहीं बनता। वह एक प्रश्न से बनता है। बाहर मंदिर बाद में उठते हैं, मूर्तियाँ बाद में आती हैं, शास्त्र बाद में खुलते हैं, गुरु की वाणी बाद में सुनाई देती है। सबसे पहले भीतर कहीं एक हल्की-सी बेचैनी जन्म लेती है। जीवन चलता रहता है, शरीर बड़ा होता रहता है, इच्छाएँ आती-जाती रहती हैं, रिश्ते बनते-बिखरते रहते हैं, पर इन सबके बीच कभी-कभी मनुष्य अचानक ठहरकर पूछता है—यह सब है क्या? यही प्रश्न का जन्म है।
यह प्रश्न हमेशा शब्दों में नहीं आता। कभी किसी प्रिय के चले जाने पर आता है, कभी सफलता के बाद भी बची हुई खाली जगह से आता है, कभी रात के आकाश को देखते हुए उठता है। मनुष्य पूछता है, ईश्वर कौन है, पर भीतर से वह सच में पूछ रहा होता है—मैं कौन हूँ? क्योंकि जो ईश्वर को जानना चाहता है, वह पहले से ही अपने भीतर किसी ऐसे सत्य की सुगंध लिए बैठा है जो संसार की किसी वस्तु से तृप्त नहीं होता।
बच्चा जब जन्म लेता है, वह ईश्वर से दूर नहीं होता। वह किसी धर्म, सिद्धांत या पूजा-पद्धति को नहीं जानता, फिर भी उसमें सहज खुलापन होता है। फिर धीरे-धीरे नाम चढ़ते हैं, पहचानें चढ़ती हैं, संस्कार चढ़ते हैं। उसे बताया जाता है—यह तुम्हारा नाम है, यह तुम्हारा परिवार है, यह तुम्हारा धर्म है, यह तुम्हारा लक्ष्य है। वह इतना भर जाता है कि अपने मूल मौन को भूल जाता है। भूलना ही संसार है।
जो कभी सहज था, वही खोया हुआ लगता है। जो कभी स्वाभाविक था, वही साधना बन जाता है। मनुष्य अपने ही घर से निकलता है, रास्तों में भटकता है, तीर्थ करता है, मंत्र जपता है, ध्यान करता है, रोता है, पुकारता है—और अंत में पाता है कि जहाँ पहुँचना था, वहाँ से कभी निकला ही नहीं था।
आरंभ में ईश्वर बाहर खड़ा दिखाई देता है। कोई रक्षक, कोई पिता, कोई माता, कोई दाता, कोई सर्वशक्तिमान सत्ता। वह ऊपर है, मैं नीचे हूँ। वह पूर्ण है, मैं अधूरा हूँ। यही द्वैत की पहली पूजा है। और यह भी पवित्र है, क्योंकि इसमें स्मरण है। जो ईश्वर को बाहर मानकर पुकारता है, उसमें कम-से-कम एक दिशा खुली है।
पर अद्वैत पूछता है—प्रश्न पूछने वाला कौन है? शरीर बदलता रहा, मन बदलता रहा, भावनाएँ बदलती रहीं, पर कुछ है जो इन सबको जानता है। तुम कहते हो, मेरा शरीर, मेरा मन, मेरा प्रश्न। जो मेरा है, वह मैं कैसे हो सकता हूँ? यह जानने वाला कौन है? यही खोज ईश्वर की खोज को आत्मा की खोज में बदल देती है।
ईश्वर कोई वस्तु नहीं जिसे मन पकड़ सके। पर मन की यात्रा को तुरंत नकारना भी उचित नहीं। मन बच्चे की तरह है; उसे रूप चाहिए, नाम चाहिए, सहारा चाहिए। शुरुआत में साधक ईश्वर को रूप में पकड़ता है। यह पकड़ धीरे-धीरे प्रेम में पिघलती है, फिर प्रेम मौन में पिघलता है, और मौन स्वयं सत्य को प्रकट करता है।
सच्चा प्रश्न कैद को हिला देता है। जब तुम सच में पूछते हो, ईश्वर कौन है, तब यह प्रश्न तुम्हें नहीं छोड़ता। वह तुम्हें मंदिर ले जाता है, फिर मंदिर से भीतर ले जाता है। वह तुम्हें मूर्ति के सामने झुकाता है, फिर झुकने वाले को देखने कहता है। अंत में प्रश्न ही प्रश्नकर्ता को खा जाता है।
ईश्वर को खोजने से पहले यह देखो कि खोज कहाँ से उठ रही है। प्रश्न बाहर नहीं जन्मता। संसार केवल अवसर देता है। प्रश्न भीतर की गहराई से उठता है, क्योंकि सत्य स्वयं तुम्हें अपनी ओर बुला रहा होता है।
अभ्यास
आज कुछ देर शांत बैठो और केवल यह पूछो—मैं ईश्वर को क्यों खोज रहा हूँ?
उत्तर मत बनाओ।
प्रश्न को भीतर उतरने दो।
जो भी भाव उठे, उसे देखो।
देखने वाले को पहचानने की शुरुआत यहीं है।