अध्याय 1
अद्वैत क्या है — और क्या नहीं है
अद्वैत कोई मत नहीं है। मत मन में रहता है; अद्वैत वह है जिसमें मन भी आता-जाता दिखाई देता है। इसलिए अद्वैत को समझना भर पर्याप्त नहीं, क्योंकि जो समझता है वही उसका पहला आवरण है। जब तक अद्वैत एक विचार है, तब तक वह द्वैत ही है: एक जानने वाला, एक जाना हुआ, और बीच में ज्ञान की धारा। सत्य में यह तीनों भेद टिकते नहीं। वहाँ जानना भी अपने मूल में लौट जाता है, और बचता है केवल वह प्रकाश जिसमें जानना और न जानना दोनों प्रकट होते हैं।
माण्डूक्य उपनिषद् इसी कारण आरम्भ से ही अस्तित्व को किसी दूर ईश्वर, किसी दूर लोक, किसी दूर भविष्य में नहीं रखता। वह कहता है: जो है, अभी है; जो था और जो होगा, वह भी इसी एक अक्षर में समाहित है।
ॐ इत्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव। यच्चान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव॥
इसी बोध को महावाक्य कहता है:
प्रज्ञानं ब्रह्म॥
सामान्यतः लोग अद्वैत को सुनते ही कहते हैं, “तो सब एक है।” यह वाक्य आधा सच और आधा भ्रम है। यदि “सब एक है” का अर्थ यह है कि पत्थर और मनुष्य व्यवहार में समान हैं, तो यह मूर्खता है। यदि इसका अर्थ यह है कि दुखी को देखकर करुणा की आवश्यकता नहीं, तो यह कठोर अज्ञान है। यदि इसका अर्थ यह है कि साधना, धर्म, उत्तरदायित्व सब निरर्थक हैं, तो यह अद्वैत नहीं, अहंकार का सूक्ष्मतम रूप है। अद्वैत व्यवहार को नकारता नहीं; वह व्यवहार को उसके सही स्थान पर रखता है।
शंकराचार्य परंपरा इस विवेक को स्पष्ट करती है:
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्येत्येवंरूपो विनिश्चयः। सोऽयं नित्यानित्यवस्तुविवेकः समुदाहृतः॥
अद्वैत नास्तिकता नहीं है, क्योंकि यह शून्यता में गिरना नहीं सिखाता। यह कहता है कि जो कुछ भी है, उसका सत्य आधार चैतन्य है। अद्वैत भागना नहीं है, क्योंकि भागने वाला मन है और मन जहाँ भी जाता है, अपना संसार साथ ले जाता है। अद्वैत उदासीनता नहीं है, क्योंकि उदासीनता में भी एक ठंडा अहंकार बचा रहता है। अद्वैत में करुणा स्वाभाविक होती है, क्योंकि दूसरा कोई पराया नहीं रह जाता; फिर भी व्यवहार में भेद का सम्मान रहता है। ज्ञानी भूखे को भोजन देता है, यह सोचकर नहीं कि “मैं दूसरे को दे रहा हूँ”, बल्कि इसलिए कि चैतन्य में उठी पीड़ा उसी चैतन्य में उत्तर पाती है।
अद्वैत का केंद्र आत्मा है, पर आत्मा शब्द से भ्रम पैदा होता है। लोग आत्मा को शरीर के भीतर बैठी किसी सूक्ष्म सत्ता की तरह सोचते हैं। पर उपनिषद् जिस आत्मा की बात करते हैं, वह भीतर-बाहर से परे है। “भीतर” और “बाहर” दोनों शरीर से जुड़े हुए शब्द हैं; आत्मा वह है जिसमें शरीर और दिशा दोनों दिखाई देते हैं।
अयमात्मा ब्रह्म॥
इसलिए अद्वैत का आरम्भ आस्था से नहीं, पहचान से होता है। आस्था कहती है: “शायद ऐसा है।” पहचान कहती है: “इससे पहले कि मैं कुछ मानूँ, मैं हूँ।” इस “मैं हूँ” को किसी नाम, रूप, इतिहास, जाति, उपलब्धि या दोष से मत जोड़ो। केवल “मैं हूँ” में टिककर देखो। वहाँ अभी व्यक्तित्व नहीं है, केवल अस्तित्व है। इस अस्तित्व का प्रकाश ही प्रज्ञान है।
अद्वैत की सबसे बड़ी कठिनाई उसका बहुत सरल होना है। मन जटिल चीज़ों को महत्व देता है, क्योंकि जटिलता में उसका काम चलता रहता है। यदि सत्य दूर है, तो यात्रा चाहिए; यदि सत्य दुर्लभ है, तो उपलब्धि चाहिए; यदि सत्य किसी विशेष अनुभव में है, तो अनुभव को पकड़ने का उद्योग चाहिए। पर अद्वैत कहता है: तुम्हारे होने से अधिक निकट कुछ नहीं। इस निकटता को मन कम समझता है, क्योंकि मन निकटतम को वस्तु नहीं बना सकता। जैसे आंख सबको देखती है पर स्वयं को दृश्य नहीं बना पाती, वैसे ही आत्मा सबको प्रकाशित करती है पर स्वयं प्रकाशित वस्तु नहीं बनती।
यही कारण है कि “नेति, नेति” की परंपरा अद्वैत में इतनी महत्त्वपूर्ण है। यह शरीर नहीं, यह विचार नहीं, यह भावना नहीं, यह स्मृति नहीं, यह भूमिका नहीं। पर यह नकार निराशा नहीं है। यह धीरे-धीरे झूठी पहचान की परतें हटाता है, जैसे मूर्ति पर जमी धूल हटे तो मूर्ति बनाई नहीं जाती, केवल प्रकट होती है। साधक को सावधान रहना चाहिए कि नकार को जीवन-विरोध न बना दे। शरीर को नकारने का अर्थ शरीर से घृणा नहीं; मन को नकारने का अर्थ मन को कुचलना नहीं। अर्थ केवल इतना है कि इन सबमें “मैं” की अंतिम मुहर न लगाई जाए।
अद्वैत में ईश्वर भी नष्ट नहीं होता; उसकी समझ परिष्कृत होती है। आरम्भ में ईश्वर उपास्य है, साधक उपासक है। यह पवित्र द्वैत मन को शुद्ध करता है। फिर धीरे-धीरे स्पष्ट होता है कि उपासना की अग्नि, उपासक का प्रेम और उपास्य का प्रकाश—तीनों एक ही चैतन्य में हैं। भक्ति का चरम अद्वैत में सूखता नहीं; वह और निर्मल हो जाता है, क्योंकि अब प्रेम किसी कमी से नहीं, पूर्णता से उठता है। ज्ञानी का नमस्कार किसी दूसरे को नहीं, उसी एक को है जो सभी रूपों में झलकता है।
इसलिए अद्वैत को जीवन में उतारने का पहला संकेत है: भाषा कम निर्णायक होती है, दृष्टि अधिक निर्णायक होती है। कोई व्यक्ति “सब ब्रह्म है” कहकर भी भय में जी सकता है; कोई बिना शब्द जाने भी शांत उपस्थिति में सत्य के निकट हो सकता है। शास्त्र भाषा देता है, पर बोध दृष्टि बदलता है। दृष्टि बदलते ही वही संसार, वही परिवार, वही शरीर, वही कर्म—सब हल्के हो जाते हैं, क्योंकि उनमें अब अंतिम सत्य का भार नहीं रखा जाता।
फिर प्रश्न उठता है: यदि यह इतना निकट है, तो हम इसे देखते क्यों नहीं? उत्तर सरल है: क्योंकि हम देखने वाली सत्ता को वस्तुओं में खोजते हैं। आंख स्वयं को आंख से नहीं देख सकती; पर उसके बिना कोई दृश्य नहीं। मन आत्मा को विचार बनाकर पकड़ना चाहता है; पर आत्मा वह है जिसमें विचार उठता है। यही भूल माया का द्वार है। अद्वैत समझ में आ सकता है, पर जब तक माया की प्रकृति न समझी जाए, समझ अपनी ही छाया से हारती रहती है।
यहीं से दूसरा अध्याय खुलता है: यदि ब्रह्म ही सत्य है, तो यह बहुविध जगत् क्या है? और वह शक्ति क्या है जो है भी, और नहीं भी?